राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के मुद्दा का भले ही मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी चुनावी भाषणों में डंके की चोट पर इस्तेमाल करती रही हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस मसले पर सरकार के रवैये से संतुष्ट नहीं है. देश की सर्वोच्च अदालत ने फटकार लगाते हुए कहा है कि केंद्र सरकार एनआरसी का काम रोकने पर तुली हुई है.

दरअसल, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह अर्जी लगाई थी कि लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सुरक्षाबलों की कमी है, इसलिए एनआरसी की प्रक्रिया को दो हफ्ते तक रोकने की इजाजत दी जाए. गृह मंत्रालय की इस अपील पर कोर्ट ने नाराजगी जाहिर करते हुए मंगलवार को कहा कि ऐसा लगता केंद्र एनआरसी के काम को रोकने पर तुला हुआ है. इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि एनआरसी को अंतिम रूप देने के लिए 31 जुलाई की जो समय-सीमा है, उसे नहीं बढ़ाया जाएगा.

गृहमंत्री ने दिया ये जवाब

कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी के बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि सरकार तय समय-सीमा के अंदर एनआरसी की प्रक्रिया पूरी करने के लिए प्रतिबद्ध है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी विदेशी को NRC में शामिल नहीं किया जाए और कोई भी भारतीय नागरिक इसमें शामिल होने से छूटे नहीं.

कोर्ट में केंद्र सरकार ने दिया ये तर्क

मंगलवार को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से पेश अटॉर्नी जनरल के.के वेणुगोपाल ने अपनी दलील में कहा कि नामांकन पत्र दाखिल करने की आखिरी तारीख से आगामी चुनाव की तारीख के दो हफ्ते बाद तक यह प्रक्रिया रोक दी जाए क्योंकि असम में एनआरसी के काम में लगी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) की 167 कंपनियों को चुनावों के दौरान कानून व्यवस्था बरकरार रखने के लिए देश के अन्य हिस्सों में भेजा जाएगा.

उनकी इस दलील पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस आर.एफ नरीमन की पीठ ने कहा, 'हमें यह कहते हुए दुख हो रहा है कि गृह मंत्रालय NRC की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाने पर तुला हुआ है और वह इस अदालत द्वारा किए जा रहे सभी प्रयासों पर पानी फेरने में लगा है.'

कोर्ट ने दिया ये फॉर्मूला

केंद्र सरकार की इस समस्या पर पीठ ने कुछ निर्देश भी दिए. कोर्ट ने सरकार से कहा कि एनआरसी का काम करने के लिए राज्य सरकार के 3457 अधिकारियों को मुक्त रखा जाए. साथ ही यह भी कहा कि इस बात पर विचार किया जाए कि चुनाव के मद्देनजर जिलाधिकारी या अपर जिला मजिस्ट्रेट के तबादले न किए जाएं.

आंकड़ा न मिलने पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान एक और मौका आया जब केंद्र सरकार पर पीठ ने सख्त अंदाज में टिप्पणी. दरअसल, कोर्ट ने पूछा था कि CAPF के कितने जवान उपलब्ध हैं और चुनाव के दौरान सुरक्षा बलों की कितनी कंपनियों की जरूरत होगी. इस पर गृह मंत्रालय के अधिकारी के जवाब से कोर्ट संतुष्ट नहीं हुआ और चीफ जस्टिस ने कहा कि क्या आप चाहते हैं हम गृह सचिव और अन्य संबंधित अधिकारियों को तलब करें.

काम करने के 100 तरीके

इस पर जब के.के वेणुगोपाल और असम सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता ने हस्तक्षेप करने का प्रयास किया तो पीठ ने कहा कि अधिकारियों ने उन्हें पर्याप्त जानकारी नहीं दी है. पीठ ने कहा, 'अगर आपमें इच्छाशक्ति है तो काम करने के 100 तरीके हैं. भारत सरकार बिल्कुल सहयोग नहीं कर रही है. एनआरसी की प्रक्रिया को रोका जा रहा है. चुनाव निश्चित तौर पर शांतिपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से होने चाहिए. उसी तरह, एनआरसी का काम भी शांति के साथ होना चाहिए.' पीठ ने यहां तक कहा दिया कि क्या हम सरकार से बहुत ज्यादा मांग रहे हैं.

हालांकि, सुरक्षाबलों की जरूरत पर अटॉर्नी जनरल ने बताया कि 2014 के लोकसभा चुनावों में 2500 सीएपीएफ कंपनियां तैनात की गई थीं और इस साल कानून व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए तकरीबन 2700 कंपनियों की जरूरत होगी. उन्होंने कहा कि असम में एनआरसी के काम की निगरानी के लिए सीएपीएफ की 167 कंपनियां लगी हुई हैं और चुनाव के दौरान उन्हें देश के अन्य हिस्से में भेजा जाएगा.

इस पर जस्टिस गोगोई की पीठ ने कहा कि आपके (केंद्र के) पास 3000 सशस्त्र कंपनियां हैं. आपको चुनाव के लिये 2700 कंपनियों की जरूरत है. असम में एनआरसी के काम के लिए 167 कंपनियों की जरूरत है. फिर समस्या क्या है? कोर्ट के इस तर्क पर वेणुगोपाल ने कहा कि हमें सीमा की भी रक्षा करने की आवश्यकता है. देश की सुरक्षा इसमें शामिल है.

वेणुगोपाल ने यह भी कहा कि चुनाव के दौरान राजनीतिक माहौल काफी गरम रहने की उम्मीद है और ऐसे में एनआरसी मामलों पर सुनवाई उपयुक्त नहीं होगी. तमाम दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने यहा भी कहा कि एनआरसी के लिए राज्य के अधिकारियों की मदद की जाए और पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया. इस मामले पर अब मार्च के पहले सप्ताह में सुनवाई होगी.