मेवाड़ के राजपूताना साम्राज्य की राजधानी रहे उदयपुर में आजादी के बाद से कांग्रेस का पलड़ा भारी रहा, लेकिन हाल में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने उदयपुर संसदीय क्षेत्र की 8 सीटों में से 7 पर जीत का परचम लहराया है.
आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर सभी सियासी दल चुनावी मोड में आ गए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राजस्थान के टोंक से चुनावी अभियान का आगाज करते हुए मोदी है तो मुमकिन है का नारा दिया. तो वहीं राज्य की सत्ता में वापसी करने वाली कांग्रेस भी बदले सियासी समीकरण में लोकसभा चुनाव में राज्य की 25 सीटों में से ज्यादातर सीटें हथियाने की जुगत में है.
राजस्थान का आदिवासी बहुल मेवाड़ क्षेत्र या उदयपुर संभाग के बारे में आम धारणा है कि जो मेवाड़ जीतता है वही राजस्थान जीतता है. लेकिन दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनाव में मिलाजुला नतीजा रहा. इस लिहाज से कहा जा सकता है उदयपुर में जंग का मैदान पूरी तरह से खुला है और कोई भी दल खुद को मजबूत नहीं कह सकता.
राजनीतिक पृष्ठभूमि
उदयपुर लोकसभा सीट आजादी के बाद से ही कांग्रेस का गढ़ रही. आजादी के बाद उदयपुर सीट पर हुए 16 लोकसभा चुनाव में 10 बार कांग्रेस, 4 बार बीजेपी और 2 बार अन्य कब्जा रहा. राजपूताना के गौरवशाली इतिहास को संजोए हुए उदयपुर लोकसभा शुरू से ही हाईप्रोफाइल सीट रही, इस सीट पर बड़े-बड़े दिग्गजों ने हाथ आजमाया. प्रदेश में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे मोहनलाल सुखाड़िया, कांग्रेस की दिग्गज नेता गिरिजा व्यास, बीजेपी के दिग्गज नेता गुलाबचंद कटारिया और रघुवीर मीणा इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं.
उदयपुर लोकसभा सीट फिलहाल अनुसूचित जनजाति के आरक्षित सीट है. जब यह सीट सामान्य हुआ करती थी तब यहां सबसे ज्यादा तीन बार गिरिजा व्यास सांसद रहीं. आजादी के बाद हुए 5 आम चुनाव में लगातार इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा. लेकिन 1971 में स्वतंत्र पार्टी ने जीत हासिल की. तो वहीं 1977 की जनता लहर में भारतीय लोकदल के उम्मीदवार की जीत हुई.

1980 में कांग्रेस के दिग्गज और पूर्व मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया ने जीत दर्ज की. तो वहीं 1984 के चुनाव में उनकी पत्नी इंदूबाला सुखाड़िया जीतीं. 1989 में बीजेपी से गुलाबचंद कटारिया ने बारी मारी. इसके बाद 1991 और 1996 के लोकसभा चुनाव में लगातार दो बार कांग्रेस की गिरिजा व्यास ने जीत का परचम लहराया. लेकिन 1998 का चुनाव गिरिजा व्यास बीजेपी के शांतिलाल चपलोत से हार गईं. इसके ठीक एक साल बाद 1999 में गिरिजा व्यास ने बीजेपी के शांतिलाल चपलोत को हराकर एक बार फिर वापसी की. लेकिन 2004 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की किरण माहेश्वरी के सामने गिरिजा व्यास को हार का सामना करना पड़ा. 2009 के चुनाव में यह सीट अनुसूचित जाति के आरक्षित हो गई. इस बार कांग्रेस के रघुवीर मीणा सांसद बने. लेकिन 2014 की मोदी लहर में रघुवीर मीणा यह सीट बचा नहीं पाए और बीजेपी के अर्जुनलाल मीणा सांसद बने.
सामाजिक ताना-बाना
झीलों की नगरी नाम से मशहूर उदयपुर का गौरवशाली इतिहास रहा है. इसकी स्थापना महाराणा उदयसिंह ने की और मेवाड़ पर शासन करने वाले सिसोदिया राजवंश की राजधानी बनाई. उदयपुर लोकसभा सीट पर मतदाता अपना फैसला जातिगत समीकरण के आधार पर ही करते हैं. पूर्व में हुए चुनावों के ट्रेंड पर नजर डाले तो राजपूत, ब्राह्मण, वैश्य एकजुट होकर बीजेपी के पक्ष में वोट डालते आए हैं. जबकि जाट, गुर्जर, मीणा और दलित कांग्रेस के पक्ष में मतदान करते रहे. इसके अलावा अनुसूचित जनजाति और पिछड़ी जातियों का मत स्थानीय समीकरण के हिसाब से दोनों दलों में बंटता रहा.

उदयपुर की कुल जनसंख्या 29,52,477 है जिसका 81 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण और 18 प्रतिशत हिस्सा शहरी है. जबकि कुल आबादी का 5.05 फीसदी अनुसूचित जाति और 59.08 फीसदी अनुसूचित जनजाति हैं, जिसमें मीणा भी शामिल हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों के मुताबिक उदयपुर सीट पर मतदाताओं की संख्या 18,17,940 है, जिसमें 9,30,007 पुरुष और 8,87,933 महिला मतदाता हैं.
उदयपुर संसदीय क्षेत्र जिले की आठ में सें 6 सीट-गोगुंदा, झाडोल, खेरवाड़ा, सलूंबर, उदयपुर ग्रामीण और उदयपुर शहर के अलावा प्रतापगढ की धरियावाद और डूंगरपुर की आसपुर विधानसभा सीट मिलाकर बनाया गया है. हाल में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इस क्षेत्र में अपना दबदबा कायम रखा है. .यहां की 8 सीटों में से 7 सीटों पर बीजेपी का कब्जा है जबकि 1 सीट पर कांग्रेस काबिज है.
2014 का जनादेश
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में उदयपुर सीट पर 65.6 फीसदी मतदान हुआ जिसमें बीजेपी को 55.3 फीसदी और कांग्रेस को 35.5 फीसदी वोट मिले. इस चुनाव में बीजेपी के अर्जुनलाल मीणा ने कांग्रेस के रघुवीर मीणा को 2,36,762 मतों के भारी अंतर से पराजित किया. जहां अर्जुनलाल मीणा को 6,60,373 वोट मिले तो वहीं कांग्रेस के रघुवीर मीणा को 4,23,611 वोट मिले.
सांसद का रिपोर्ट कार्ड
दिसंबर 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक सांसद अर्जुन लाल मीणा की पिछले 5 सालों के दौरान लोकसभा में उपस्थिति 86 प्रतिशत रही है. इस दौरान उन्होंने 81 डिबेट में हिस्सा लिया है और 344 प्रश्न पूछे. अर्जुनलाल मीणा ने अपने सांसद विकास निधि की कुल आवंटित राशि का 74.24 फीसदी क्षेत्र के विकास कार्य पर खर्च किया.