रायपुर। यूएनडीपी के मुताबिक वर्ष 2017 में भारत में जन्म लेने वाले बच्चे की औसत उम्र 68.8 है, जबकि नार्वे में 82.3 वर्ष। छत्तीसगढ़ में इसे लेकर स्थिति और भी चिंतित हो जाती है, क्योंकि यहां स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं का ग्रामीण आंचलों में भारी अभाव है। कमोबेश यही स्थिति शिक्षा की भी है। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के पद बड़ी संख्या में रिक्त हैं। सरकारी स्कूल के शिक्षा के स्तर में सुधार की सख्त जरूरत है।

छत्तीसगढ़ में डॉक्टरों की कमी बड़ी समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानक के अनुसार प्रदेश में सेटअप से 15 गुना ज्यादा डॉक्टरों की जरूरत है। 25600 डॉक्टर की आवश्यकता है, जबकि हैं 1873 ही। इनमें भी 410 पद खाली हैं। अभी सरकार ने 250 पदों पर नियुक्तियां जरूर की हैं। छत्तीसगढ़ में दो करोड़ 56 लाख की आबादी के लिए अभी 1463 डॉक्टर ही हैं। यानी 17498 लोगों में एक डॉक्टर है। कई क्षेत्र तो ऐसे हैं जहां पर यह आंकड़ा लाखों में पहुंच जाता है।
तीन वर्षीय पाठयक्रम वाले लोग अस्पताल चला रहे हैं। मरीज जरा भी गंभीर हुआ तो रायपुर, बिलासपुर रेफर कर देते हैं। बीमारी की जद में मरीजों की जान निकला जाती है। जो स्थिति स्वास्थ्य की है वही शिक्षा की भी। समय पर इलाज न मिलना एक बड़ी चिंता है। 108 एंबुलेंस सेवा से कुछ राहत मिली है, कम से कम अस्पताल तो मरीज पहुंच जा रहे हैं। इलाज मिले न मिले, अलग बात है।

प्रदेश में स्कूलों की स्थिति

सरकारी स्कूल 47 हजार, शिक्षकों की संख्या 2.50 लाख। रायपुर- स्कूलों की संख्या 2500, शिक्षक- 12 हजार।

प्रदेश की स्थिति-
प्रदेश में 6 सरकारी और तीन निजी मेडिकल कालेज हैं। पं. जवाहरलाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय रायपुर समेत 6 मेडिकल कालेजों में हर साल 650 और तीन निजी मेडिकल कॉलेज चंदूलाल, शंकराचार्य और रिम्स मेडिकल कॉलेज हैं। सीट 450 हैं लेकिन बीते साल से जीरो ईयर है। डॉक्टर्स न मिलने की वजह कॉलेजों की कम संख्या, कम सीट और निजी कॉलेजों की संख्या भी कम है। ये मान्यता ही नहीं बचा पा रहे हैं।

50 लाख से अधिक लोग पड़ते हैं बीमार
हर साल औसतन 50 लाख मरीज प्रदेश के अस्पतालों में पंजीकृत होते हैं। बस्तर और सरगुजा संभाग की स्थिति सबसे खराब है। यहां डॉक्टरों के सेटअप के ही पद नहीं भरे जा सके हैं। बस्तर संभाग में विशेषज्ञ डॉक्टरों के जहां 95 फीसदी पद खाली हैं, वहीं चिकित्सा अधिकारियों के 56 फीसदी पद रिक्त हैं।

मेडिकल हब रायपुर पर सुविधाओं की कमी
रायपुर ने प्रदेश की राजधानी बनने के बाद स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में खासी तरक्की की है। पैसा आया तो लोगों ने इसे शिक्षा और स्वास्थ्य में ही इनवेस्ट किया। यहां पर बड़े-बड़े निजी अस्पताल, स्कूल खुलते ही चले गए। सरकारी अस्पताल की स्थिति में सिर्फ रायपुर में ही सुधार देखने को मिला। मगर कमियां वही हैं जो पूरे प्रदेश में है।

बस्तर की तुलना में रायपुर में डॉक्टर् हैं, स्पेशलिस्ट हैं, सुपरस्पेशलिस्ट हैं लेकिन कमी तो यहां भी है। पंडरी में नव निर्मित अस्पताल में पुलिस लाइन का जिला अस्पताल इसलिए शिफ्ट नहीं किया जा रहा है, क्योंकि यहां डॉक्टर नहीं है। यही हाल 100 बिस्तर वाले माना सिविल अस्पताल का है। 13 करोड़ की लागत से अस्पताल तो बन गया, लेकिन अभी भी बिस्तर 20 ही हैं। इसे पीपीपी मोड पर देने की तैयारी है।

प्रदेश शासन को चाहिए कि वह रायपुर में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति को बेहतर करने के साथ-साथ संपूर्ण प्रदेश का ध्यान रखे। हर व्यक्ति तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचे। हालांकि जल्द ही वर्तमान सरकार आयुष्मान योजना को बंद करके यूनिवर्सल हेल्थ स्कीम को लांच करने की तैयारी में हैं। कहा जा रहा है कि हर व्यक्ति को मुफ्त स्वास्थ्य सेवा मुहैया करवाई जाएगी।