लोकसभा चुनाव अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंचने को है। यूपी की राजनीति में पूर्वांचल और अवध का हमेशा से अपना महत्व रहा है। पूर्वांचल की बात अगर की जाए तो गठबंधन की असल परीक्षा यहीं बताई जा रही है। पूर्वांचल की कुछ सीटें ऐसी भी हैं, जहां आजादी के बाद हुए चुनावों में गठबंधन की सहयोगी पार्टियों सपा-बसपा का खाता तक नहीं खुल सका है। मगर कुछ सीटें ऐसी भी हैं जहां इन्हीं दोनों पार्टियों का दबदबा रहा है, लेकिन लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा की ऐसी आंधी चली कि दोनों पार्टियां अपना गढ़ तक नहीं बचा सकीं। इसीलिए गठबंधन के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा वाला बताया जा रहा है।

बड़ी चुनौती: पूर्वांचल व अवध की सीटों का इतिहास टटोलने पर पता चलता है कि कई सीटें ऐसी हैं जिन पर गठबंधन के दोनों बड़े सहोगियों को सफलता कभी नहीं मिली है। सपा-बसपा को अब इन सीटों पर गठबंधन की ताकत साबित करने की बड़ी चुनौती है। पूर्वांचल की बांसगांव सीट की बात करें तो गठबंधन की सहयोगी सपा एक बार जीत दर्ज करा चुकी है, लेकिन बसपा का खाता तक नहीं खुला। गाजीपुर पर बसपा कभी जीत का परचम नहीं लहरा सकी। वाराणसी में न तो कभी हाथी दौड़ सका और न कभी साइकिल चल सकी। गठबंधन में वाराणसी सीट सपा के कोटे में है। कुशीनगर सीट का नाम पहले पडरौना हुआ करता था। सपा यहां से कभी जीत नहीं दर्ज करा पाई। 

बसपा को साबित करनी होगी अहमियत
गठबंधन में बसपा के कोटे में आने वाली सीटों की बात करें तो डुमरियागंज से 2004 में बसपा ने एक बार जीत दर्ज की। बस्ती में 2004 और संतकबीरनगर व देवरिया में 2009 में बसपा जीती। बांसगांव में बसपा का खाता तक नहीं खुल सका। लालगंज से बसपा के बलिराम तीन बार 1996, 1999 और 2009 में सांसद चुने गए। इस बार संगीता को चुनाव मैदान में उतारा गया है। घोसी से बसपा 1999 व 2009 दो बार चुनाव जीत चुकी है। सलेमपुर से 1999 व 2009 में जीती। जौनपुर से 2009 में धनंजय सिंह जीते। मछलीशहर से 2004 उमाकांत यादव जीत चुके हैं। गठबंधन में सपा को मिली सीटों का इतिहास देखें तो परफारमेंस बेहतर रहा है।

महराजगंज सीट पर उसने 1999 में पहली बार जीत दर्ज की। कुशीनगर (पहले पडरौना)सीट से बालेश्वर यादव 1998 के चुनाव में दूसरे स्थान तक पहुंचने में सफल रहे। यह बात अलग है कि बालेश्वर 2004 के चुनाव में नेलोपा के टिकट से चुन कर संसद पहुंचे। वाराणसी के बाद आजमगढ़ पूर्वांचल की काफी अहम सीट मानी जाती है। इतिहास पर नजर डालें तो सपा के लिए यह सीट फलदायी रही है। सपा कुल तीन बार इस सीट पर जीत का परचम लहरा चुकी है। वर्ष 2014 में मुलायम सिंह ने पहली बार चुनाव लड़कर सपा का झंडा फहराया था। इस बार यहां से उनके पुत्र व सपा मुखिया अखिलेश यादव मैदान में हैं।

सपा को दिखना होगा वही दम
गठबंधन में सपा को मिली सीटों का इतिहास देखें तो परफारमेंस बेहतर रहा है। महराजगंज सीट पर उसने 1999 में पहली बार जीत दर्ज की। कुशीनगर (पहले पडरौना)सीट से बालेश्वर यादव 1998 के चुनाव में दूसरे स्थान तक पहुंचने में सफल रहे। यह बात अलग है कि बालेश्वर 2004 के चुनाव में नेलोपा के टिकट से चुन कर संसद पहुंचे। वाराणसी के बाद आजमगढ़ पूर्वांचल की काफी अहम सीट मानी जाती है। इतिहास पर नजर डालें तो सपा के लिए यह सीट फलदायी रही है। सपा कुल तीन बार इस सीट पर जीत का परचम लहरा चुकी है। वर्ष 2014 में मुलायम सिंह ने पहली बार चुनाव लड़कर सपा का झंडा फहराया था। इस बार यहां से उनके पुत्र व सपा मुखिया अखिलेश यादव मैदान में हैं।