रायपुर। छत्तीसगढ़ ने एक और राजकीय पशु वनभैंसा को खो दिया। 10 दिनों से जख्मी 22 साल के जुगाड़ू ने शनिवार दोपहर 1.20 बजे दम तोड़ दिया। वन विभाग ने इसे बचाने की हर संभव कोशिश की। दिल्ली से डॉक्टरों की स्पेशल टीम भी बुलाई। मगर मौत है कि मात दे गई। वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार 12 दिन पहले उदंती-सीतानदी अभयारण्य में 10 साल के प्रिंस (वनभैंसा) की जुगाड़ू से जमकर लड़ाई हुई थी। इसी में जुगाड़ू घायल हो गया था।

उसके पैर में चोट लगी थी। कुछ दिनों तक वह चला, मगर धीरे-धीरे चलना-फिरना बंद कर दिया। वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के स्टेट प्रोजेक्ट अफिसर आरपी मिश्रा के मुताबिक उसे बगैर बेहोश किए इलाज दिया जा रहा था। उम्र 22 साल हो चुकी थी। बेहोश करने पर उसकी हालत में सुधार मुश्किल थी।
जलाया नहीं दफनाया जाएगा

जुगाड़ू की मौत के बाद रायपुर से वन विभाग के तमाम आला अफसर देर रात ही उदंती पहुंच गए हैं। रविवार सुबह उसका अंतिम संस्कार जलाकर नहीं बल्कि दफनाकर किया जाएगा। ढाई महीने बाद उसे कब्र से निकाला जाएगा। उसके कंकाल को जोड़कर म्यूजियम में रखा जाएगा, जिससे कि यादों में वह हमेशा जिंदा रहे। वन विभाग इसे लेकर तमाम तैयारियां कर चुका है।
वन्यजीव विशेषज्ञों ने उठाए सवाल

जुगाड़ू की मौत पर 'नईदुनिया' को वन्यजीव विशेषज्ञों ने फोन किया। उन्होंने कुछ सवाल खड़े किए हैं। जैसे- जुगाड़ू को जख्मी हालत में 40 डिग्री तापमान में खुले आसमान के नीचे क्यों रखा गया, जबकि ट्रीटमेंट सेंटर है? वहां ले जाया जा सकता था। संभव था कि वह कुछ दिन और जी जाता। वन विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया गया है। हालांकि वे इस बात को स्वीकार करते हैं कि जुगाड़ू उम्रदराज हो चुका था।
जुगाड़ू का नामकरण करने वाले डब्ल्यूटीआइ के स्टेट प्रोजेक्ट अफिसर आरपी मिश्रा की जुबानी

बात 2005 की है। उस समय मैं जंगल में था। जुगाड़ू पांच फीट के नाले के एक तरफ था और मैं दूसरी तरफ। हम दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे। वह नाला पार नहीं कर सकता है, इसलिए मैं निश्चिंत था। उसकी पहली तस्वीर मैंने ही ली थी। वह जुगाड़ नाले के पास मिला, इसलिए मैंने उसे जुगाड़ू नाम दे दिया। मैं आखिरी वक्त पर उसके साथ था। वह शक्तिशाली वनभैंसा था। जब आप किसी वन्यजीव के इतने नजदीक होते हैं तो उसकी मौत आपको विचलित कर देती है।