इन्दौर । रेसकोर्स रोड़ स्थित मोहता भवन पर चल रहे पुण्य कलश तप महोत्सव की धर्मसभा में राष्ट्रसंत रत्नसुंदर सूरीश्वर म.सा. ने आज भक्तों का आव्हान किया कि वे जितना समय मोबाईल पर अपनी अंगुलियों को घुमाने में खर्च करते हैं, उतना ही समय मंदिर और अन्य धर्मस्थलों को भी दें। यदि यह मुश्किल लगता हो तो इसके उलट मोबाईल को उतना ही समय दें, जितना मंदिर को देते हैं। इसी तरह यह कोशिश भी करें कि जीवनभर एक ही थिएटर में फिल्म देखने जाएंगे, चाहे दुनिया में कहीं भी रहें। जैसे पहले घर में एक ही चूल्हा रखने की परंपरा थी, उसी तरह एक ही मोबाईल और एक ही थिएटर का प्रयोग करने का संकल्प  भी लेना चाहिए।  
आचार्यश्री ने आज उत्तराध्यन सूत्र के विभिन्न संदर्भों की व्याख्या के दौरान उपस्थित हजारों श्रावक-श्राविकाओं को आशीर्वचन देते हुए कहा कि मनुष्य जीवन हमें लाटरी से मिला है, पूंजी से नहीं। करोड़पति बनने के लिए जिस तरह से व्यापार-कारोबार और लाटरी में से कोई एक तरीका होता हैं, मनुष्य जन्म भी हमारे पिछले जन्म के पुण्य कर्मों की लाटरी से मिला है। मनुष्य जन्म सबसे श्रेष्ठ इसलिए नहीं है कि हमें बहुत सारा धर्म करने की पात्रता है, बल्कि इसलिए है कि हम मनुष्य रहते हुए पाप का त्याग कर सकते हैं। भगवान यदि आपसे कोई आशीर्वाद मांगने का कहें तो उनसे जीवन भर धर्म करने की नहीं, पाप का त्याग करने की क्षमता देने का कहें। संसार में रह कर हम धर्म तो कर सकते हैं, पाप नहीं छोड़ सकते। धर्म की प्रवृत्ति हमें स्वर्ग में ले जा सकती हैं लेकिन पाप से निवृत्ति हमें मोक्ष में ले जाएगी। हम धर्म की प्रवृत्ति तो चाहते हैं, लेकिन पाप से निवृत्ति नहीं चाहते। हमारी कमजोरी धर्म करना नहीं, पाप छोड़ना है।  प्रारंभ में रत्नत्रयी श्रीसंघ की ओर से प्रकाश बड़नगर, विजय मेहता, जयेश देसाई, शांतिप्रिय डोसी, कीर्तिभाई डोसी एवं चंद्रेश मेहता ने आचार्यश्री तथा साधु-साध्वी भगवंतों की अगवानी की। चातुर्मास आयोजन समिति के कल्पक गांधी एवं यशवंत जैन ने बताया कि आचार्यश्री के प्रवचन सुबह 9 से 10 बजे तक मोहता भवन पर होंगे। आगामी तीन अन्य रविवारों को भी ‘समंदर में मोती की खोज’ विषय पर विशेष प्रवचनों की अमृत वर्षा होगी। सोमवार 5 अगस्त को सुबह 9.15 से दोपहर 12 बजे तक क्रिकेट क्विज कान्टेस्ट का दिलचस्प आयोजन होगा जिसमें सवालों की गेंदबाजी के सामने जवाबों की बल्लेबाजी का अदभुत नजारा देखने-सुनने को मिलेगा। अब तक 21 टीमें बनाई जा चुकी हैं। उधर पुण्य कलश तप महोत्सव में आज 11वें दिन भी आचार्यश्री ने तपस्वियों को दिए जाने वाले कलशों को वासक्षेप से अभिसिक्त किया। इस दौरान जिनशासन की जयघोष के उदघोष भी गूंजते रहे। 
:: प्रवचन :: 
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य जीवन, परमात्मा के वचनों का श्रवण, रूचि, कृति और स्मृति-ये चार बातें बहुत दुर्लभ हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण तत्व है स्मृति। हर धर्म के अनुष्ठान की जड़ स्मृति है। संसार के किसी भी क्षेत्र में स्मृति के बिना सफलता नहीं मिल सकती। हमने अब तक प्रवचनों को श्रुति का ही विषय बना रखा है, स्मृति का नहीं। प्रवचन केवल पांडाल और उपाश्रय तक ही सिमित रह गए हैं। कम सुनेंगे तो चलेगा लेकिन स्मृति कम नहीं होना चाहिए। अपने मोबाईल में कुछ सेव करना है तो परमात्मा के वचन जरूर सेव करें, डिलिट करना है तो गंदी बातों को बिना देरी किए हटा देना चाहिए। मंदिर जाने के लिए पांच चीचें जरूरी होती हैं। ये हैं समाग्री, समय ,सयोंग, श्रद्धा और स्वास्थ, जबकि टीवी का त्याग करने के लिए केवल अपने मन को मारना होता हैं। पांच करोड़ का मंदिर बनाने वाला और रोज चार घंटे पूजा करने वाला भी किसी मुनि या संत के समकक्ष नहीं हो सकता। इस दुलर्भ मनुष्य जन्म का सदुपयोग तभी संभव है, जब हमारे मन में किसी के आंसू पोंछने का भाव आ जाए। यदि छोटी छोटी बातों को सहन करने की सहज रूचि है तो मान ले कि मनुष्य जन्म हमें पूंजी से मिला हैं, लाटरी से नहीं। वहीं छोटी बातों पर कषाय करेंगे तो मान ले कि हमारा जन्म लाटरी से हुआ है।