लखनऊ   भारत अब वैक्सीन के जरिए मले‎रिया से लड़ने की तैयारी कर रहा है। केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआइ) के वैज्ञानिक इस प्रयास में जुट गए हैं। वैक्सीन निर्माण की प्रारंभिक प्रक्रिया के नतीजे भी उत्साहजनक सामने आए हैं। चूहों पर किया गया ट्रायल पूरी तरह सफल साबित हुआ है। अब पूरे शोध को एथिकल कमेटी के समक्ष रखा जाएगा, जिसकी अनुमति मिलते ही इंसानों पर वैक्सीन के प्रयोग शुरू हो जाएंगे। वैज्ञानिकों को उम्मीद है ‎कि भारत मलेरिया पर अंकुश लगाने की दिशा में बड़ी उपलब्धि हासिल करने के करीब है। अब तक मलेरिया के नियंत्रण के लिए कोई प्रभावी दवा या वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। वक्त के साथ इसके परजीवी में प्रतिरोधक क्षमता भी विकसित हो चुकी हैं। जिस कारण मौजूदा दवाएं निष्क्रिय साबित हो रही हैं। जो वैक्सीन उपलब्ध हैं वे मात्र 50 फीसद तक ही असरदार हैं। डॉ सतीश मिश्रा के अनुसार मादा एनाफिलीज मच्छर के काटने पर परजीवी प्लाच्मोडियम फेल्सीपीरम त्वचा से रक्त में और फिर लिवर में पहुंच जाता है। लिवर कोशिकाओं में यह बहुत तेजी से खुद की संख्या बढ़ाता है। दूसरा परजीवी प्लाच्मोडियम वाइवेक्स लिवर में शांत पड़ा रहता है और कभी भी रोग का कारण बन जाता है।
डॉ. मिश्रा के मुताबिक, उन्होंने शोध के दौरान लिवर में मौजूद छह हजार जीन में से उस एक जीन (एससीबी) की पहचान की, जो परजीवियों को उनकी संख्या बढ़ाने में मदद करता है। जब मलेरिया परजीवी लिवर में पहुंचता है, तो उसे वहां चक्र पूरा करने में करीब 60 घंटे का वक्त लगता है। इसके बाद वह ब्लड में जाता है। इस जीन को निष्क्रिय करने से 45 से 48 घंटे तक तो वह खुद की संख्या में इजाफा करता है मगर बाद में विकसित नहीं होता। परजीवी के जीन 30-40 घंटे के दौरान प्रोटीन बनाते रहते हैं, जो उसके प्रतिरक्षी तंत्र को मजबूत करते हैं। वैक्सीन तैयार करने के लिए एससीबी जीनरहित परजीवी को वैक्सीन के रूप में तीन डोज में इंजेक्ट किया जाएगा। जब भी किसी मनुष्य को मच्छर काटेगा उसमें मौजूद परजीवी की एंटीबॉडीज उसे वहीं खत्म कर देंगी। डॉ. मिश्रा को इस शोध के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) ने सम्मानित भी किया है। 1897 में पहली बार मलेरिया के वाहक मादा एनाफिलीज के बारे में पता चला। इसकी खोज अंग्रेज सैन्य अधिकारी के बेटे रोनाल्ड रॉस ने की थी जिसके लिए उन्हें 1992 में नोबल पुरस्कार भी मिला। सर्वाधिक प्रभावित राज्य ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश। अगस्त से अक्टूबर तक सबसे ज्यादा प्रभाव।