कसाब ने खुद को बताया था 17 साल का, उज्ज्वल निकम ने ऐसे खोली उम्र की सच्चाई

26/11 मुंबई आतंकी हमले के आरोपी अजमल कसाब का मुकदमा चल रहा था. अभियोजन पक्ष के पास उसके खिलाफ गवाह थे, घटनास्थल से मिले सबूत थे और खुद कसाब के बयान भी थे. मामला पहली नजर में बेहद मजबूत दिखाई दे रहा था. लेकिन तभी कसाब ने अदालत में एक ऐसा दावा किया, जिसने पूरे केस की दिशा बदलने की कोशिश की. उसने कहा, मैं 17 साल का हूं. हिंदी फिल्म प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम में इसी कानूनी लड़ाई को अहम जगह दी गई है. फिल्म में राजकुमार राव मशहूर सरकारी वकील उज्ज्वल निकम की भूमिका निभा रहे हैं. फिल्म के ट्रेलर में भी अदालत के अंदर कसाब का यही दावा सुनाई देता है कि मैं 17 साल का हूं.

लेकिन सवाल था कि अगर कसाब वाकई नाबालिग साबित हो जाता तो क्या होता? और उज्ज्वल निकम ने आखिर कैसे साबित किया कि कसाब अदालत में अपनी उम्र को लेकर झूठ बोल रहा था? कसाब ने क्यों कहा, मैं 17 साल का हूं?

अप्रैल 2009 में मुकदमा शुरू होने के कुछ ही समय बाद कसाब के वकील अब्बास काजमी ने अदालत में उसकी उम्र को लेकर दावा किया. बचाव पक्ष का कहना था कि 26/11 के हमलों के वक्त कसाब नाबालिग था. इसके आधार पर उन्होंने मामले को जुवेनाइल जस्टिस कोर्ट में भेजने की मांग की.

इस दावे का महत्व इसलिए बहुत ज्यादा था, क्योंकि अगर अदालत कसाब को कानूनी तौर पर नाबालिग मान लेती, तो उसे मौत की सजा नहीं दी जा सकती थी. जुवेनाइल जस्टिस कानून के तहत उसके लिए अधिकतम सजा तीन साल के जुवेनाइल रिमांड होम तक सीमित हो सकती थी.

उज्ज्वल निकम ने इस मांग का तुरंत विरोध किया. अभियोजन पक्ष का कहना था कि उम्र कम बताने की कोशिश मुकदमे को लंबा खींचने और मौत की सजा से बचने की रणनीति थी. लेकिन केवल तर्क से कसाब की उम्र साबित नहीं हो सकती थी. निकम को ठोस सबूत चाहिए था.

उज्ज्वल निकम ने मेडिकल जांच को बनाया हथियार
निकम ने कसाब की उम्र की विस्तृत फॉरेंसिक जांच कराने की मांग की. इसके बाद मुंबई के सर जेजे अस्पताल में चार डॉक्टरों की एक मेडिकल टीम ने उसकी जांच की. टीम का नेतृत्व डॉ. नंदा कुमार ने किया.

कसाब की उम्र का पता लगाने के लिए हड्डियों के जुड़ने यानी बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट और दांतों की जांच की गई. सवाल सीधा था कि कसाब का शरीर उसकी उम्र के बारे में क्या बता रहा है? मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपी. इसमें एक्स-रे के जरिए जोड़ों के जुड़ने और अक्ल की दाढ़ निकलने जैसे संकेतों का अध्ययन किया गया. जांच के आधार पर कसाब की उम्र 20 से 26 साल के बीच आंकी गई.

रिपोर्ट के मुताबिक, 26 नवंबर 2008 की रात जब मुंबई पर आतंकी हमला हुआ था, उस समय कसाब की उम्र कम से कम 19 साल 6 महीने थी यानी अदालत में किया गया उसका ‘मैं 17 साल का हूं’ वाला दावा मेडिकल जांच के सामने टिक नहीं पाया.

लेकिन निकम यहीं नहीं रुके. अभियोजन पक्ष ने कसाब के गिरफ्तार होने के बाद के आधिकारिक रिकॉर्ड खंगाले. इन रिकॉर्ड्स में उसकी उम्र को लेकर ऐसे बयान मौजूद थे, जो अदालत में किए गए उसके नाबालिग होने के दावे से बिल्कुल अलग थे.

सबसे पहले जेल रिकॉर्ड सामने आया. आर्थर रोड सेंट्रल जेल की तत्कालीन अधीक्षक स्वाति साठे ने गवाही दी कि जेल में दाखिल किए जाने के समय कसाब ने अपनी उम्र 21 साल बताई थी. इसके बाद अस्पताल का रिकॉर्ड सामने आया. 27 नवंबर 2008 को घायल कसाब का नायर अस्पताल में इलाज हुआ था. डॉक्टर राघवन ने अदालत में बताया कि शुरुआती इलाज के दौरान कसाब ने अपनी उम्र 21 साल बताई थी. लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण एक और दस्तावेज था, कसाब का खुद का न्यायिक इकबालिया बयान.

मजिस्ट्रेट के सामने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दर्ज अपने बयान में कसाब ने आधिकारिक तौर पर खुद को 21 साल का बताया था यानी अभियोजन पक्ष के पास सिर्फ मेडिकल रिपोर्ट नहीं थी. उसके पास कसाब के अपने पुराने बयान, जेल और अस्पताल के आधिकारिक रिकॉर्ड और फॉरेंसिक जांच सब एक ही दिशा में इशारा कर रहे थे. बचाव पक्ष ने पाकिस्तान से जन्म प्रमाण पत्र मंगाने की कोशिश की

जब मेडिकल रिपोर्ट और पुराने रिकॉर्ड कसाब के खिलाफ जाने लगे तो बचाव पक्ष ने एक और रास्ता अपनाया. अप्रैल 2009 में अब्बास काजमी ने अदालत से अपील की कि कसाब के पाकिस्तान स्थित गांव फरिदकोट से उसके नगर निकाय के जन्म रिकॉर्ड हासिल करने के लिए एक रोगेटरी लेटर जारी किया जाए या वहां एक कमीशन भेजा जाए.

अभियोजन पक्ष ने इसका विरोध किया. निकम का तर्क था कि पाकिस्तानी अधिकारी उस समय कसाब की नागरिकता तक से इनकार कर रहे थे, ऐसे में वहां से आधिकारिक रिकॉर्ड हासिल करने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो सकते हैं.

विशेष न्यायाधीश एमएल तहिलयानी ने बचाव पक्ष की मांग खारिज कर दी. अदालत ने सर जेजे अस्पताल की रेडियोलॉजिकल जांच को कसाब के वयस्क होने का निर्णायक सबूत माना.

क्या अदालत में कसाब ने सिर्फ उम्र को लेकर ही कहानी बदली?
उज्ज्वल निकम ने बाद में अपने कई इंटरव्यू में दावा किया कि कसाब अदालत में अपनी छवि और माहौल को प्रभावित करने की कोशिश करता रहता था. एक इंटरव्यू में निकम ने बताया था कि कसाब कभी आंसू बहाने का नाटक करता, कभी मासूमियत दिखाने की कोशिश करता और जब विदेशी पर्यवेक्षक या पत्रकार अदालत में मौजूद होते, तब अपने बयानों में बदलाव करता था.

निकम के मुताबिक, ऐसी बदलती कहानियों का जवाब देने का सबसे मजबूत तरीका था- ऐसे सबूतों पर टिके रहना जिन्हें बदला नहीं जा सकता. यानी घटनास्थल के सबूत, आधिकारिक रिकॉर्ड और मेडिकल जांच. सीधी भाषा में कहें तो कसाब अपनी कहानी बदल सकता था, लेकिन सबूत नहीं बदल सकते थे.

सुप्रीम कोर्ट ने भी मेडिकल सबूत को माना
बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी कसाब की उम्र तय करने के लिए इस्तेमाल की गई मेडिकल जांच को स्वीकार किया. अगस्त 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने कसाब की मौत की सजा बरकरार रखते हुए अपने फैसले में बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट पर निचली अदालत के भरोसे को सही माना.

जस्टिस आफताब आलम और जस्टिस सीके प्रसाद की पीठ ने मेडिकल जांच के आधार पर कसाब के वयस्क होने के निष्कर्ष को स्वीकार किया. इस तरह अदालत में 17 साल की उम्र का उसका दावा टिक नहीं सका.

‘प्रहार’ में दिखेगी यही कानूनी जंग
अब इसी पूरे घटनाक्रम को फिल्मी पर्दे पर ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ के जरिए दिखाया जा रहा है. फिल्म के ट्रेलर से साफ है कि कसाब की उम्र को लेकर हुई यह कानूनी लड़ाई कहानी का एक अहम हिस्सा है.

फिल्म में राजकुमार राव उज्ज्वल निकम की भूमिका निभा रहे हैं, जबकि सिकंदर खेर कसाब के बचाव पक्ष के वकील के किरदार में नजर आएंगे. अविनाश अरुण के निर्देशन में बनी इस फिल्म में जयदीप अहलावत एक विदेशी राजनयिक प्रतिनिधिमंडल के सदस्य की भूमिका में हैं. वहीं आशीष विद्यार्थी जज और वामिका गब्बी और नासिर भी अहम भूमिकाओं में हैं. प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम 16 अक्टूबर को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है.

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